(24x7newstime Correspondent)
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूचियों में नियमित तौर पर संशोधन होना चाहिए।
न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक बार की प्रक्रिया केवल सूची तैयार करने के लिए होती है, लेकिन नियमित आधार पर संशोधन प्रक्रिया होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दस्तावेजों की संख्या में वृद्धि ”मतदाता-हितैषी” है, न कि ”मतदाता-विरोधी।” पीठ ने याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं से कहा, ”उन दस्तावेजों की संख्या पर गौर करें जिनसे आप नागरिकता साबित कर सकते हैं।”
पीठ ने कहा कि अब मतदाता द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले 11 दस्तावेज है। इससे पहले किए गए संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान में सिर्फ सात दस्तावेज जमा करने होते थे। इससे यह पता चलता है कि यह प्रक्रिया ”मतदाता-हितैषी” थी।
अदालत ने कहा कि हालाँकि याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि आधार को स्वीकार न करना मतदाता सूची से हटाने वाला कदम है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि दस्तावेज़ों की बड़ी संख्या वास्तव में बेहतर थी। पीठ ने वकील से कहा, ”राज्य में पहले किए गए संक्षिप्त पुनरीक्षण में दस्तावेज़ों की संख्या सात थी और विशेष पुनरीक्षण में यह 11 है, जो दर्शाता है कि यह मतदाता हित में है। हम आपकी दलीलों को समझते हैं कि आधार को स्वीकार न करना बहिष्कृत करने वाला है, लेकिन दस्तावेज़ों की अधिक संख्या वास्तव में समावेशनकारी है।” याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग के 24 जून, 2025 के (मतदाता सूची में विशेष पुनरीक्षण) आदेश को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की है।
शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि चुनाव आयोग ने आश्चर्यजनक रूप से आठ करोड़ मतदाताओं के लिए नए दस्तावेज़ों की आवश्यकता बतायी है।
उन्होंने पूछा, ”भले ही मैं जेल में हूँ, मुझे उचित प्रक्रिया के बिना मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। यहाँ, हटाए गए 65 लाख मतदाताओं को ऐसे किसी भी आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया गया। चुनाव आयोग ने बड़े पैमाने पर लोगों के नाम हटाए हैं। चुनाव आयोग को ऐसा करने का अधिकार किसने दिया” इस पर अदालत ने कहा, ”लेकिन मतदाता सूची स्थिर नहीं रह सकती। एक बार की प्रक्रिया केवल मूल सूची तैयार करने के लिए होती है और इसे संशोधित किया जाना चाहिए।” शंकरनारायणन ने आगे कहा कि चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में भी बिना किसी परामर्श के यह प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन्होंने कहा, ”मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार अच्छा है। संविधान मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के मेरे अधिकार की गारंटी देता है।” वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और अन्य अधिवक्ताओं ने भी दलीलें दीं। एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग पर दुर्भावनापूर्ण इरादे का आरोप लगाया। चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं गैर सरकारी संगठन (एनजीओ)- एडीआर, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा, स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव, राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा, कांग्रेस पार्टी के नेता के सी वेणुगोपाल और मुजाहिद आलम सहित अन्य ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को चुनौती दी है। शीर्ष अदालत इस मामले में गुरुवार को भी सुनवाई करेगी।





