(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)
नयी दिल्ली। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में विरोध प्रदर्शनों पर लगाये गये प्रतिबंध की कड़ी निंदा करते हुए इसे छात्र-विरोधी और तानाशाही कदम करार दिया है। संगठन का कहना है कि यह फैसला सामाजिक रूप से वंचित और जागरूक छात्रों की आवाज़ दबाने का प्रयास है।
एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने मंगलवार को बयान जारी कर आरोप लगाया कि यह निर्णय “मोदी सरकार द्वारा विश्वविद्यालय परिसरों की लोकतांत्रिक भावना को कुचलने और सामाजिक न्याय की मांग कर रहे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की आवाज़ दबाने की सुनियोजित कोशिश है।
उन्होंने कहा कि जब भी छात्र आरक्षण, समानता और न्याय जैसे मुद्दों पर सवाल उठाते हैं, तो उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश की जाती है। श्री चौधरी ने आरोप लगाया कि परिसर में कुछ संगठनों के कार्यक्रमों को खुली अनुमति दी जाती है जबकि प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्र संगठनों पर प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए जाते हैं। उन्होंने इसे शैक्षणिक संस्थानों में “खतरनाक मानसिकता” का संकेत बताया।
बयान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों में चल रहे घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भेदभाव के विरुद्ध नियमों की मांग अब देशव्यापी छात्र आंदोलन का रूप ले रही है।
एनएसयूआई ने यह भी आरोप लगाया कि यह प्रतिबंध श्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के व्यापक एजेंडे का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य असहमति की आवाजों को नियंत्रित करना है। संगठन ने कहा कि संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है और कोई भी मनमाना प्रशासनिक आदेश लोकतांत्रिक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता है।
एनएसयूआई ने दिल्ली विश्वविद्यालय और देशभर के छात्रों के साथ एकजुटता जताते हुए चेतावनी दी है कि परिसर में लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने का कोई भी प्रयास छात्र आंदोलन को और अधिक मजबूत करेगा।





