Tuesday, June 2, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अंश को लेकर एनसीईआरटी की कक्षा आठ की पाठ्यपुस्तक प्रतिबंधित की

(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। न्यायालय ने ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ का संदर्भ देने वाले एक अध्याय पर गंभीर आपत्ति जताते हुए पुस्तक की सभी प्रतियों (मुद्रित और डिजिटल) को स्कूलों, दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से तुरंत वापस लेने का आदेश दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पांचोली की पीठ ने कहा कि अध्याय की सामग्री न्यायपालिका की गरिमा और अधिकार को कम करने का एक गहरा और जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होती है।
न्यायालय ने अवमानना अधिनियम के तहत एनसीईआरटी के निदेशक और स्कूल शिक्षा विभाग को नोटिस जारी कर पूछा कि उनके और इसमें शामिल अन्य लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। विवादित हिस्से को तैयार करने वाले नेशनल सिलेबस बोर्ड के सदस्यों के नाम और विवरण मांगते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा, “यह एक सुनियोजित कदम है। पूरे शिक्षण समुदाय को बताया जाएगा कि न्यायपालिका भ्रष्ट है और मामले लंबित हैं। फिर छात्र और माता-पिता। यह एक गहरी साजिश है।”
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि पुस्तक में शब्दों और भावों का चयन केवल अनजाने में या सद्भावनापूर्ण त्रुटि नहीं हो सकता है। न्यायालय ने उन बैठकों का विवरण भी मांगा है जिनमें इस अध्याय की सामग्री पर चर्चा हुई और इसे मंजूरी दी गई थी।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इसकी गहरी जाँच चाहते हैं। हमें यह पता लगाने की आवश्यकता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है और हम देखेंगे कि इसमें कौन लोग शामिल हैं। जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी, हम इस मामले को बंद नहीं करेंगे।” न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई यह कार्यवाही निष्पक्ष आलोचना को दबाने या न्यायपालिका के बारे में शैक्षणिक चर्चा को रोकने के लिए नहीं है। न्यायालय ने कहा कि स्वस्थ बहस संस्थाओं को मजबूत करती है। हालांकि, युवा छात्रों को ऐसे एकतरफा और भ्रामक विमर्श के संपर्क में नहीं लाया जाना चाहिए जो न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को नुकसान पहुँचा सके। न्यायालय ने पाया कि पुस्तक लोकतांत्रिक ढांचे को संरक्षित और मजबूत करने में उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों द्वारा निभाई गई भूमिका पर मौन है। पीठ ने कहा कि यदि सामग्री को जानबूझकर न्यायपालिका को कमजोर करने का प्रयास पाया गया, तो यह आपराधिक अवमानना के समान हो सकता है। अनुपालन रिपोर्ट दाखिल होने के बाद इस मामले पर फिर से विचार किया जाएगा। न्यायालय ने एनसीईआरटी के उस संवाद पर भी आपत्ति जताई जिसमें अध्याय की सामग्री का बचाव किया गया था। यह विवाद कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय से संबंधित है, जिसमें कथित तौर पर ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ विषय के तहत ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर चर्चा की गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा मुख्य न्यायाधीश के समक्ष इस मामले को ध्यान में लाया गया था, जिसके बाद अदालत ने कहा कि वह पहले ही इस मुद्दे पर संज्ञान ले चुकी है।

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