लखनऊ(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की मेयर सुषमा खरकवाल इन दिनों चर्चा में हैं । उच्च न्यायालय ने उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज कर दिए हैं । इस इस पूरे मामले के केंद्र में रहे समाजवादी पार्टी (सपा) के पार्षद ललित किशोर तिवारी ने आरोप लगाते हुए कहा है कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के साथ होने की वजह से ही उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। अदालत के निर्देश के बावजूद एक पार्षद को शपथ न दिलाकर मेयर ने संवैधानिक मूल्यों का हनन किया है ।
समाजवादी पार्टी (सपा) से जुड़े ललित किशोर तिवारी ने अपने प्रकरण को लेकर ‘यूनीवार्ता’ से विस्तार से बातचीत करते हुए यह बातें कहीं।
दरअसल, नगर निकाय चुनाव 2023 में लखनऊ के वार्ड 73 से जुड़ा विवाद अब मेयर तक जा पहुंचा है। उच्च न्यायालय ने सपा के निर्वाचित पार्षद ललित किशोर तिवारी को पांच महीने तक शपथ न दिलाने पर कड़ा रुख अपनाया है। 21 मई को न्यायालय ने आदेश की अवहेलना मानते हुए मेयर के प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार सीज करने का आदेश जारी कर दिया था ।
लखनऊ के वार्ड 73 में भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला उर्फ टिंकू शुक्ला और सपा के ललित किशोर तिवारी के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। मतगणना में प्रदीप शुक्ला को 4,972 और ललित तिवारी को 3,298 मत मिले थे। नतीजों के आधार पर प्रदीप शुक्ला को निर्वाचित घोषित कर दिया गया था।
चुनाव के बाद 13 मई 2023 को ललित तिवारी ने अपर जिला जज न्यायालय में याचिका दाखिल की। इसमें आरोप लगाया कि प्रदीप शुक्ला ने नामांकन के समय चुनावी शपथपत्र में दूसरी शादी और अन्य जरूरी व्यक्तिगत जानकारी छिपाई।
याचिका में कहा गया कि यह जानकारी देना कानूनन अनिवार्य था और इसे छिपाना चुनावी नियमों का उल्लंघन व कदाचार की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर चुनाव परिणाम निरस्त करने की मांग की गई थी।
मामले में करीब ढाई साल तक सुनवाई चली। न्यायालय ने नामांकन के समय दाखिल शपथपत्र, हलफनामे और निर्वाचन प्रपत्रों की समीक्षा की। न्यायालय ने माना कि जरूरी जानकारी न देना गंभीर अनियमितता है और इससे चुनाव की वैधता प्रभावित होती है। 19 दिसंबर 2025 को न्यायालय ने प्रदीप कुमार शुक्ला का निर्वाचन रद्द कर दिया और ललित किशोर तिवारी को वार्ड 73 का पार्षद निर्वाचित घोषित कर दिया।
ललित किशोर तिवारी ने बताया कि निर्वाचित घोषित होने के बावजूद उन्हें शपथ नहीं दिलाई गई। वहीं भाजपा के प्रदीप शुक्ला अब भी पार्षद के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके बाद हमने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।
श्री तिवारी ने कहा, ” सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि जिलाधिकारी ने 23 जनवरी और 10 फरवरी 2026 को नगर आयुक्त को निर्वाचन न्यायाधिकरण के फैसले की जानकारी दी थी। साथ ही धारा-85 के तहत शपथ दिलाने की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने भी 4 फरवरी 2026 को इस संबंध में जरूरी कार्रवाई के आदेश जारी किए थे। इसके बाद भी शपथ नहीं दिलाई गई ।”
श्री तिवारी ने कहा, ” संवैधानिक मूल्यों और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनी रहनी चाहिये । मेयर अपने आपको इन सबसे ऊपर मानकर चल रही थीं । मेरे ऊपर कई तरह के दबाव बनाये जा रहे हैं और प्रलोभन दिए जा रहे हैं लेकिन हमारी लड़ाई अंत तक जारी रहेगी।”
इधर , 12 मई को उच्च न्यायालय ने एक सप्ताह में ललित तिवारी को शपथ दिलाने का आदेश दिया था। इस आदेश को प्रदीप शुक्ला ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।
आदेश के बावजूद कार्रवाई न होने पर उच्च न्यायालय ने मेयर, जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने को कहा था।
लगातार आदेशों की अनदेखी पर 21 मई को उच्च न्यायालय ने इसे आदेश की अवहेलना माना और लखनऊ मेयर के प्रशासनिक व वित्तीय अधिकारों को सीज करने का आदेश जारी कर दिया था। इस मामले में अब अगली सुनवाई 29 मई को है ।





