Tuesday, June 2, 2026
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उच्चतम न्यायालय में यूजीसी विनियम के नियम 3(सी) के खिलाफ याचिका दायर

(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय में हाल ही में अधिसूचित ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026’ के नियम 3(सी) को चुनौती दी गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इस प्रावधान के तहत ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा गैर-समावेशी है।
नियम 3(सी) ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को केवल ‘अनुसूचित जाति(एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के विरुद्ध जाति या जनजाति के आधार पर’ होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित करता है।
याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने आरोप लगाया है कि यह प्रावधान संस्थागत सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र को विशेष रूप से केवल एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों तक सीमित करता है। इस प्रकार, यह अन्य जाति समूहों के उन व्यक्तियों को बाहर कर देता है, जिन्हें जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
याचिका में दावा किया गया है कि यह नियम अपने वर्तमान स्वरूप में गैर-एससी/एसटी/ओबीसी व्यक्तियों को शिकायत निवारण और संस्थागत सुरक्षा उपायों तक पहुंच से वंचित करता है और इसलिए यह संवैधानिक रूप से कमजोर है।
याचिकाकर्ता ने अधिकारियों को नियम 3(सी) को लागू करने या उस पर कार्रवाई करने से रोकने के निर्देश देने की मांग की है। इसके साथ ही न्यायालय से आग्रह किया है कि ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की जाति-निरपेक्ष और संवैधानिक रूप से अनुकूल परिभाषा अनिवार्य की जानी चाहिए, जो जातिगत पहचान की परवाह किए बिना उन सभी व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करे जिनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है।
याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि नियम 3(सी) पर पुनर्विचार लंबित रहने तक, विनियमों के तहत जाति-निरपेक्ष तरीके से सबको समान अवसर उपलब्ध कराई जाए।
इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने कहा कि जातिगत पहचान के आधार पर शिकायत निवारण तंत्र तक पहुंच प्रदान करने से इनकार करना राज्य द्वारा किया गया भेदभाव अस्वीकार्य है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
यूजीसी ने 2026 के ये नियम राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तड़वी (क्रमशः रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताएं) द्वारा 2019 में दायर एक जनहित याचिका के बाद बनाए थे। इस याचिका में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करने की मांग की गई थी।
रिपोर्टों के अनुसार, रोहित वेमुला और पायल तड़वी दोनों ने अपने विश्वविद्यालयों में कथित जाति-आधारित भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी।
मार्च 2025 में, केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि यूजीसी ने जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए नियमों का मसौदा तैयार कर लिया है। उस समय न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि उसका इरादा परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक ‘बहुत मजबूत और पुख्ता तंत्र’ सुनिश्चित करना है।
अप्रैल 2025 में, न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यूजीसी मसौदा नियमों को अंतिम रूप देने और अधिसूचित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं और अन्य हितधारकों को सुझाव देने की स्वतंत्रता भी दी थी। इसके बाद सितंबर 2025 में उच्चतम न्यायालय ने यूजीसी को विभिन्न हितधारकों से प्राप्त सुझावों पर विचार करने और नियमों को अधिसूचित करने पर अंतिम निर्णय लेने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया था।
यूजीसी ने अंततः इस साल जनवरी में इन नियमों को अधिसूचित किया।

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