(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)
नयी दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुख्य प्रवक्ता एवं सांसद अनिल बलूनी ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में किये समझौतों पर सवाल उठाते इसे ‘समझौतों की राजनीति’ से प्रेरित बताया है।
श्री बलूनी ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट की एक श्रृंखला में कांग्रेस और पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने विभिन्न ऐतिहासिक समझौतों और सीमा विवादों का हवाला देते हुए कांग्रेस पर “समझौते की राजनीति” का आरोप लगाया।
श्री बलूनी ने अपनी पोस्ट में हैशटेग कंप्रोमाइज कांग्रेस के साथ लिखा कि 1958 के जवाहरलाल नेहरू–नून समझौते के तहत पश्चिम बंगाल के बेरुबारी यूनियन का आधा हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले में न तो केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी ली गई और न ही पश्चिम बंगाल सरकार से परामर्श किया गया। उन्होंने दावा किया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि ‘प्रधानमंत्री भारतीय भूमि उपहार में नहीं दे सकते’, जिसके बाद इसे वैध बनाने के लिए संविधान का नौवां संशोधन लाया गया था।
श्री बलूनी ने कश्मीर मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि श्री नेहरू ने जनमत संग्रह की घोषणा कैबिनेट की स्वीकृति के बिना कर दी थी जिससे पाकिस्तान को एक स्थायी कूटनीतिक हथियार मिल गया। उन्होंने 1962-64 के दौरान स्वर्ण सिंह–भुट्टो वार्ता का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि उस समय भारत ने पुंछ और उरी जैसे क्षेत्रों को पाकिस्तान को सौंपने पर सहमति जताई थी और आगे गुरेज, नीलम तथा किशनगंगा घाटियों पर भी चर्चा हुई थी।
भाजपा नेता ने 1960 में पंजाब के कुछ गांव—सरजा मजरा, रख हरदित सिंह, पथानके और फिरोजपुर के हिस्सों—को पाकिस्तान को दिए जाने तथा 1968 में रन ऑफ कच्छ के कुछ हिस्सों के मध्यस्थता के जरिए पाकिस्तान के पास जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह सब कांग्रेस शासन के दौरान हुआ।
श्री बलूनी ने तिब्बत, अक्साई चिन, बेरुबारी, पंजाब के गांवों और रन ऑफ कच्छ जैसे मुद्दों का हवाला देते हुए कहा कि इन फैसलों ने भारत के मानचित्र को स्थायी रूप से प्रभावित किया। उन्होंने इसे “नेहरूवियन स्टेट्समैनशिप” बताते हुए तंज कसा और कहा कि एक व्यक्ति के समझौतों ने देश की सीमाओं को बदल दिया।





