वियना/नई दिल्ली, (एजेंसी/24×7न्यूजटाइम ब्यूरो)। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने कहा है कि ईरान के अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के भंडार को वहां से हटाना मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। उन्होंने कहा कि अगर वार्ताकार इसे ही सबसे बेहतर समाधान मानते हैं, तो ऐसा किया जा सकता है।
श्री ग्रॉसी ने एक अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल को सोमवार को बताया कि अमेरिका-ईरान के बीच जारी वार्ताओं में ईरानी यूरेनियम भंडार को देश से बाहर भेजने का विकल्प भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसा अभियान आसान नहीं है क्योंकि यह यूरेनियम गैस के रूप में जमा है और इसके भारी जोखिमों के कारण इसके प्रबंधन के लिए व्यापक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि यह गैस के रूप में है, बेहद प्रदूषक है और यह कोई आसान काम नहीं है।
महानिदेशक ने बताया कि इस यूरेनियम को ‘डाउनब्लेंड’ यानी कम शक्तिशाली रूप में बदलने जैसे वैकल्पिक विकल्पों पर भी चर्चा चल रही है। उन्होंने कहा कि राजनयिक गतिरोध के बीच रास्ता निकालने की कोशिशों में जुटे वार्ताकारों के सामने ये दोनों विचार मेज पर बने हुए हैं।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम ईरान और ईरान के बीच चल रही बातचीत में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बन गया है। हालांकि प्रतिबंधों में राहत, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव जैसे अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है, लेकिन किसी भी व्यापक समझौते के लिए ईरान के यूरेनियम भंडार का भविष्य सबसे मुख्य बिंदु बना हुआ है। आईएईए के अनुमानों के अनुसार, वर्तमान में ईरान के पास लगभग 970 पाउंड यूरेनियम है जो 60 प्रतिशत शुद्धता तक संवर्धित है, जबकि हथियार बनाने के लिए 90 प्रतिशत शुद्धता की आवश्यकता होती है। यद्यपि यह यूरेनियम अभी हथियार बनाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, फिर भी इस संवर्धन स्तर ने पश्चिमी सरकारों की चिंताएं बहुत बढ़ा दी हैं। इसका कारण यह है कि 60 प्रतिशत का स्तर ऊर्जा, अंतरिक्ष और चिकित्सा तकनीक जैसे नागरिक उपयोगों के लिए आवश्यक स्तर से बहुत अधिक है, जिनके लिए महज चार प्रतिशत से थोड़े ज्यादा संवर्धन की ही जरूरत होती है।
श्री ग्रॉसी की यह टिप्पणी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस मांग के कुछ ही दिनों बाद आई है, जिसमें उन्होंने दोहराया था कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम को या तो देश से बाहर निकाला जाए या फिर अंतर्राष्ट्रीय निगरानी में नष्ट किया जाए। श्री ट्रंप ने इस सामग्री को ‘परमाणु धूल’ (न्यूक्लियर डस्ट) कहा था और तर्क दिया था कि किसी भी स्थायी समझौते में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका उपयोग भविष्य के हथियार कार्यक्रम में न हो सके।
हालांकि आईएईए इस बातचीत में सीधे तौर पर कोई भूमिका नहीं निभा रहा है, लेकिन श्री ग्रॉसी ने स्पष्ट किया कि आईएईए दोनों पक्षों के साथ लगातार संपर्क में है और व्यावहारिक समाधान तलाशने में मदद कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम इन्हीं सब बातों पर चर्चा करते रहे हैं और इसमें हमारा योगदान इसे संभव व व्यावहारिक बनाना है।
यह मुद्दा पिछले साल ईरान के कई परमाणु ठिकानों पर अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों के बाद से और अधिक जटिल हो गया है। आईएईए ने पहले अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यूरेनियम आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा फोर्डो, नतांज और इस्फ़हान में क्षतिग्रस्त हुए तीन ठिकानों के मलबे के नीचे दबा हुआ है। इसने वार्ताओं में अनिश्चितता की एक और परत जोड़ दी है, क्योंकि निरीक्षक और तकनीकी विशेषज्ञ अभी भी इस सामग्री की स्थिति और उस तक पहुंच का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं।





