(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)
नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सर संघचालक डॉ मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि इस संगठन की स्थापना हिन्दू समाज की बुराइयों को दूर कर उसमें गुणों का विकास करने के उद्येश्य से व्यक्ति का निर्माण करने के लिए की गयी, ताकि एक स्वस्थ और मजबूत राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।
डॉ भागवत ने यहां कहा कि संघ के लिए ‘हिंदू’ का अर्थ किसी और मतावलम्बी या पूजापद्धति का विरोध नहीं है। हिंदू कोई ‘शब्दार्थ नहीं’ बल्कि एक एक ऐसी विचार-सामग्री है, जिसमें वसुधैव कुटुम्बकम की भारत की संस्कृति और अनंत के साथ एकत्व का भाव निहित है। वह संघ की सौ वर्ष की यात्रा के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले संवाद और संपर्क कार्यक्रमों के प्रारंभ में राजधानी में तीन दिन के कार्यक्रम के पहले दिन संघ की स्थापना के विषय में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा, “ हिंदू यानी क्या- जो इसमें विश्वास करता है कि अपने-अपने रास्ते पर चलो, दूसरों को बदलो मत।”
उन्होंने कहा कि बाहर के लोगों ने हमें हिंदू कहा, हमारे दर्शन को देख कर सब मतों को ईश्वर प्राप्ति का पंथ मामने की श्रद्धा रखने वाले को नाम दिया हिंदू। रास्तों को लेकर झगड़ा नहीं , जिनकी यह संस्कृति है, वह हिंदू है।”
उन्होंने कहा, “ हमारा धर्म शास्त्र हिंदू धर्म शास्त्र नहीं, बल्कि मानव धर्म शास्त्र है।.. दूसरे की श्रद्धा का भी सम्मान करो, अपमान मत करो, ये परंपरा जिनकी है, संस्कृति जिनकी है, वो हिंदू हैं।”
उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को उद्धरित करते हुए कहा, “-जो स्वयं शुद्ध चरित्र का हो, जिसका समाज से निरंतर संपर्क हो, जिस पर समाज विश्वास करता हो, जो समाज के लिए जीवन-मरण करने को तत्पर हो-ऐसा नायक चाहिए, जिसके जीवन से एक वातावरण बनता है। ऐसे नायकों का निर्माण होना चाहिए।”
संघ प्रमुख ने कहा कि नेता, नीति, पार्टी यह सब तो सहायक होते हैं, मूल कार्य तो समाज का परिवर्तन है। (राष्ट्र उन्नति के लिये) कुछ गुण हैं जिन्हें विकसित करना होता है।
उन्होंने कहा कि संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना से पहले कांग्रेस और अन्य विचारधारा के नेताओं के साथ काम करते हुए उनकी बातों में यह पाया था कि ‘ सभी यह सोचते हैं कि समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर गुणात्मक उन्नति के बाद ही समस्याओं का स्थायी समाधान हो सकता है। कुछ दोषों को निकालना जाना चाहिए और कुछ गुण है, जो पैदा होना चाहिए, पर कांग्रेस के सभी नेताओं का यह भी मानना था कि उन्होंने जो काम (राजनीतिक) लिया है वे उसे छोड़ नहीं सकते थे।”
डॉ भागवत ने कहा, “ हम हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो प्रश्न खड़ा होता है।… जब हम हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो उसमें किसी के प्रति दुराव नहीं है।.. हमारे देश में हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध आपस में संघर्ष करते हुए भी साथ रहने का अपना समाधान निकाल लेंगे और वह समाधान गैर हिंदू नहीं बल्कि हिंदू होगा।”
उन्होंने कहा कि डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के संघ का बीजारोपण 1925 से पहले हो चुका था। उद्येश्य था संपूर्ण हिंदू समाज को संगठित करना है। हिंदू समाज को जिम्मेदार समाज होना है। …हम मनुष्यों में अंतर नहीं करते थे। हमारा विचार तो ऐसा था कि मानवता और पूरी सृष्टि परमात्मा के नाम से जुड़ी है।
डॉ भागवत ने कहा, “ अपना देश है, उसकी जय जयकार होनी चाहिए, उस देश को विश्व में अग्रगण्य स्थान मिलना चाहिए।संघ के बारे में बहुत सी चर्चायें चलती आयी हैं। चर्चायें हैं, संघ के बारे में जानकारी नहीं है, जो जानकारी है, वो प्रमाणिक नहीं है। इसलिए संघ की सही जानकारी देना जो भी संघ के बारे में जानकारी हो वो परसेप्शन के आधार पर नहीं, फैक्ट (तथ्य) के आधार पर हो। निष्कर्ष निकालना सुनने वाले का अपना अधिकार है, किसी को कनवेंस नहीं करना है बस बताना है।”
उन्होंने कहा कि किसी भी सामाजिक संगठन का इतने समय तक इतना बड़ा विरोध किसी संगठन का नहीं हुआ, जितना विरोध संघ का हुआ, संगठन के लोगों की हत्यायें तक की गयी। गुरु जी के घर पर 1948 में हमला हुआ तो उन्होंने कार्यकर्ताओं को कहा, “ मेरे आंगने में मेरा लहू बहेगा, समाज का नहीं , समाज हमारा है।”
उन्होंने कहा कि संघ को अपनी स्थापना के बाद लंबे समय तक उपेक्षा और भारी विरोध का सामना करना पड़ा। पर 30-40 साल पहले कुछ लोग संघ के धुर विरोधी थे, उनमें से बहुत से लोग संघ के साथ हो गये हैं। उस समय भी वे अपने थे, आज भी अपने हैं। हमें पूरे समाज का संगठन करना है, किसी गुट का नहीं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। आजादी के 75 वर्ष बाद भारत जैसा होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि वसुधैव कुटुम्बकम की भावना भारत वर्ष की विशिष्ट स्थिति के कारण ही जन्मी है। यह जीवन के लिए यह सुरक्षित परिस्थितियों के कारण थी। भारत में हर चीज बहुतायत में थी और किसी भी झगड़े को व्यर्थता माना जाता था।
सरसंघचालक ने कहा, “ हमने इसी वातावरण में अपने अंदर के सत्य को देखा है, जिसने हमें ऐक्य दिखाया। इसीलिये हम अपनी मातृभूमि से प्रेम करते रहे हैं, इसके लिए लोगों ने प्राण दिये । जो नहीं जानते है कि वे हिंदू हैं , उन्हें हिंदवी कहने, भारतीय कहने में बुरा नहीं।
सम्पूर्ण हिंदू समाज को बनाम है। हिंदू कहने का मतलब हिंदू बनाम कोई नहीं , बल्कि परिवार,गांव जनता से लेकर अंतत की एकता।
उन्होंने कहा कि संघ का काम मनुष्य तैयार करना है और समाज का काम करने के लिए संघ के स्वयंसेवक है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों से संघ का संबंध जन्म जन्मांतर का है। उनके काम का श्रेय संघ नहीं लेता पर वे संघ के हैं इस लिए उनकी कमियों का फल संघ के हिस्से जरूर पड़ता है। संघ स्वयं सेवकों पर दबाव नहीं डालता। स्वयं सेवकों ने जो संगठन बनाये हैं, वे जनता के है, उसमें संघ से अलग के लोग भी है। उन्होंने कहा कि संघ को केवल विचार, संस्कार और आचार की चिंता तो हमें रहती है। संगठन के लिए जिम्मेदार संगठन बनाने वाले होते हैं। उन्होंने कहा, “हमारे संस्थापक ने लोगों से कहा कि हम राम या शिवाजी के आने की प्रतीक्षा कब तक करेंगे। देश का जिम्मा हम सब का है। हम जैसे होंगे, वैसे ही हमारे नेता होगा। हम पूरे समाज को संगठित करना है।”
उन्होंने कहा कि संघ को चलाने के लिए संघ किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता है। हम अपनी दृष्टि में जो अच्छा लगता है, उसे बोल देते हैं, जो बुरा लगता है, उसको भी बोल देते हुए । उसमें किसी के प्रति बैर नहीं है।
उन्होंने कहा , “इस संघ को हमें आगे लेजाना है, क्यों कि भारत को खड़ा करना है क्यों कि भारत का विशिष्ट योगदान है।”





