नयी दिल्ली(24×7न्यूजटाइम संवाददाता)। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 52 हफ्ता 52 सुधार योजना के तहत मंगलवार को नमक के परिवहन में सुधार, ऑटोमोबाइल परिवहन में सुधार, निर्माण कार्य की गुणवत्ता में सुधार, टिकट रद्द करना एवं रिफंड और ट्रेन के बोर्डिंग स्टेशन यानी यात्री के चढ़ने वाले स्टेशन में बदलाव नाम से पांच नये सुधारों की घोषणा की।
श्री वैष्णव ने कहा कि 2026 के दौरान सुधार करने के भारतीय रेल के संकल्प के अनुरूप पाँच नये सुधारों को स्वीकृति दी गई है। इन नये सुधारों की मंज़ूरी के साथ इस साल के लिए सुधारों की कुल संख्या नौ हो गयी है। उन्होंने कहा कि सुधार प्रक्रिया के तहत चार सुधारों की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी। उन्होंने बताया कि इन पाँच नए सुधारों में से दो माल ढुलाई से, एक निर्माण से और दो यात्रियों की सुविधा से संबंधित हैं।
उन्होंने बताया कि पांचवां सुधार नमक के परिवहन पर केंद्रित है। भारत दुनिया में नमक के सबसे बड़े उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है और नमक का उत्पादन करने वाले तीन प्रमुख राज्य तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान हैं। भारत में सालाना उत्पादित होने वाले लगभग 350 लाख टन नमक में से लगभग 92 लाख टन प्रति वर्ष रेल द्वारा पहुँचाया जाता है।
रेल मंत्री ने बताया कि नमक के परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी उसके उपयोग के अनुसार अलग-अलग होती है। औद्योगिक नमक के लिए यह लगभग 25 प्रतिशत है, और मानव उपभोग के लिए इस्तेमाल होने वाले नमक के लिए यह लगभग 65 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि रेलवे द्वारा पहुँचाए जाने वाले कुल नमक का 62 प्रतिशत हिस्सा 1,000 से 2,500 किलोमीटर की दूरी तय करता है, जिससे यह खंड रेल परिवहन के लिए बेहद उपयुक्त बन जाता है।
उन्होंने बताया कि नमक परिवहन में कई समस्याओं की पहचान की गई, जिनमें वैगनों का अनुपयुक्त डिज़ाइन, नमक के कारण वैगनों में जंग लगना, तिरपाल से ढके होने के बावजूद खुले वैगनों में पानी का रिसाव होना, और सामान की कई बार लोडिंग-अनलोडिंग के कारण लागत में वृद्धि और नुकसान होना शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि इन समस्याओं को हल करने के लिए अब स्टेनलेस स्टील से बना, ऊपर से लोड होने वाला और बगल से खाली होने वाला कंटेनर प्रणाली विकसित की गयी है। यह कंटेनर जंग से बचाने के लिए स्टेनलेस स्टील से बनाया गया है, और इसमें ऊपर से लोड करने के लिए फ्लैप तथा बगल से खाली करने के लिए हाइड्रोलिक तंत्र लगा है, जिससे गंतव्य स्थान पर ट्रकों में नमक को आसानी से अनलोड किया जा सकता है।
इस दौरान रेल मंत्री ने बताया कि भारतीय ऑटोमोबाइल बाज़ार प्रति वर्ष लगभग 310 लाख यूनिट बनाता है, जिसमें से यात्री वाहनों की संख्या लगभग 50 लाख इकाई होती है। यात्री वाहनों के परिवहन में रेल का हिस्सा लगभग 24 प्रतिशत है, जिससे पता चलता है कि ऑटोमोबाइल की आवाजाही का बड़ा हिस्सा अब भी सड़क मार्ग से ही होता है।
श्री वैष्णव ने कहा कि उद्योग से मिले फीडबैक में डिज़ाइन और काम करने से जुड़ी कुछ विशेष रुकावटें सामने आईं। रेलवे जिन बड़े ऑटोमोबाइल उत्पादन केंद्रों को सेवा देता है, उनमें गुजरात का महसाणा; महाराष्ट्र और कर्नाटक के चिंचवाड़ और बिदादी, आंध्र प्रदेश का पेनुकोंडा, तमिलनाडु के मेलपक्कम और वालाजाबाद और हरियाणा के गुरुग्राम का फरुखनगर शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पहले के प्रयासों में मौजूदा यात्री डिब्बों को ऑटोमोबाइल ले जाने वाले वैगनों में बदलना और नए समाधान लाना शामिल था। हालाँकि, बाद में विचार विमर्श से पता चला कि मुख्य समस्या ऑटोमोबाइल ले जाने वाले वैगनों के डिज़ाइन में थी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा वैगन डिज़ाइन या तो सिंगल-स्टैक या डबल-स्टैक बनावट के लिए ही ठीक थे, जिससे लचीलापन कम हो जाता था। उन्होंने कहा कि कई रास्तों पर सुरंगों और पुलों की वजह से रुकावटें आती हैं, जहाँ ‘आयामों की अनुसूची’ (एसओडी) की सीमाओं के कारण कुछ विशेष प्रकार के वैगनों की आवाजाही संभव नहीं हो पाती।
श्री वैष्णव ने कहा कि इस समस्या को हल करने के लिए रेलवे ने एक सुधार लागू किया है, जिसके तहत वैगनों के विशेष डिज़ाइन की अनुमति दी गई है और साथ ही उद्योग को लचीलापन भी प्रदान किया गया है। अब निर्माता विशिष्ट मूल-गंतव्य मार्गों के आधार पर, उच्च क्षमता वाले वैगनों का डिज़ाइन तैयार कर सकते हैं।
रेल मंत्री ने कहा कि अगला सुधार रेल परियोजनाओं में निर्माण की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर केंद्रित है, जिसमें सात बड़े बदलाव किए गए हैं। इसमें पहला बदलाव पात्रता मानदंडों से जुड़ा है। किसी एक परियोजना के ज़रिए ठेकेदार की क्षमता का आकलन करने की सीमा को परियोजना के मूल्य के 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल वही कंपनियाँ ऐसे कामों के लिए बोली लगा सकें जो बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने की सिद्ध क्षमता रखती हैं । इसके अलावा, पिछले अनुभव का कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा रेलवे से जुड़े कार्यों में होना ज़रूरी है, क्योंकि यह माना जाता है कि राजमार्ग, बंदरगाह और हवाई अड्डों जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी अलग-अलग जटिलताएँ होती हैं। रेलवे के कार्यों में जटिलता के स्तरों को परिभाषित किया गया है। सिग्नलिंग का काम सबसे जटिल माना गया है, जिसके बाद ओवरहेड इलेक्ट्रिकल और ट्रैक के काम आते हैं, और इसी के अनुसार संबंधित अनुभव की ज़रूरत होगी।
उन्होंने बताया कि दूसरा बदलाव बोली सुरक्षा को परियोजना के मूल्य के दो प्रतिशत पर निर्धारित करता है। इसका उद्देश्य बेतुकी बोलियों को हतोत्साहित करना और यह सुनिश्चित करना है कि केवल गंभीर प्रतिभागी ही निविदा प्रक्रिया में शामिल हों।
वहीं, तीसरा बदलाव 10 करोड़ रुपये से अधिक की सभी परियोजनाओं के लिए बोली क्षमता के अनिवार्य आकलन की शुरुआत करना है। चौथा बदलाव भ्रष्ट, धोखाधड़ी वाले और प्रतिस्पर्धा-विरोधी तरीकों पर रोक लगाने वाले कड़े दंडात्मक प्रावधानों को लागू करता है।
श्री वैष्णव ने बताया कि इसके तहत पाँचवाँ बदलाव किसी भी परियोजना के शुरू होने से पहले विस्तृत कार्य योजना को अनिवार्य बनाता है, जिससे बेहतर निगरानी हो सके और समय पर काम पूरा होना सुनिश्चित हो सके। वहीं, छठा बदलाव उप-ठेकेदारी की अनुमत सीमा को 70 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करता है। ठेकेदारों को अब अपने स्वयं के पर्यवेक्षण में कम से कम 60 प्रतिशत काम सीधे तौर पर करना होगा। इससे जवाबदेही सुनिश्चित होगी और बोली जीतने के बाद ठेकों को दूसरों को सौंपने की प्रथा में कमी आएगी।
उन्होंने बताया कि सातवाँ बदलाव ‘प्रीडेटरी बिडिंग’ (अत्यधिक कम बोली लगाने) की समस्या का समाधान करता है। रेल मंत्री ने कहा कि यदि कोई बोली अनुमानित परियोजना लागत से पांच प्रतिशत से अधिक कम है, तो बोली लगाने वाले को अतिरिक्त 5 प्रतिशत की ‘परफॉर्मेंस गारंटी’ (कार्य-निष्पादन गारंटी) देनी होगी। इसका उद्देश्य उन अवास्तविक बोलियों को हतोत्साहित करना है जिनके कारण बाद में विवाद, मध्यस्थता और परियोजना में देरी होती है।
उन्होंने बताया कि ये बदलाव मिलकर रेल परियोजनाओं को लागू करने की रूपरेखा को मज़बूत बनाते हैं। ये सख़्त नैतिक और दंडात्मक उपायों के ज़रिए पारदर्शिता और ईमानदारी को बढ़ाते हैं; सख़्त पात्रता नियमों और कम उप-ठेकेदारी (सब-कॉन्ट्रैक्टिंग) के ज़रिए गुणवत्ता सुनिश्चित करते हैं; और तय बोली सुरक्षा, बोली क्षमता का आकलन, और अतिरिक्त परफॉर्मेंस गारंटी जैसे तरीकों से परियोजना के समय पर काम पूरा होने को बढ़ावा देते हैं। कुल मिलाकर, इन कदमों का उद्देश्य अधिक जवाबदेह, कुशल और मज़बूत अवसंरचना विकास प्रणाली बनाना है।
रेल मंत्री ने कहा कि इस साल का आठवां सुधार यात्री सुविधा पर केंद्रित है, जिसमें टिकटिंग सिस्टम के गलत इस्तेमाल को रोकने और असली यात्रियों के लिए पहुंच बेहतर बनाने के उपाय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि टिकटों की कालाबाज़ारी और तत्काल सिस्टम का गलत इस्तेमाल बड़ी चिंता का विषय रहा है। इस समस्या से निपटने के लिए, रेलवे ने बॉट और धोखाधड़ी वाले सॉफ्टवेयर का पता लगाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया। आधुनिक तकनीकी उपायों ने तत्काल विंडो खुलते ही तुरंत टिकट बुक करने की एजेंटों और दलालों की क्षमता पर रोक लगा दी, साथ ही आधार-आधारित ओटीपी वेरिफिकेशन भी शुरू किया गया। विस्तृत डेटा विश्लेषण के आधार पर आईआरसीटीसी सिस्टम से लगभग तीन करोड़ नकली खातों की पहचान करके उन्हें हटा दिया गया। इससे टिकटों की उपलब्धता में काफ़ी सुधार हुआ।
उन्होंने बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए ट्रेनों के प्रस्थान से 48, 12 और चार घंटे पहले टिकट रद्द करने की पुरानी समय-सीमा को बदलकर अब 72, 24 और आठ घंटे कर दिया गया है। यह बदलाव आरक्षण चार्ट तैयार करने की प्रक्रिया के अनुरूप किया गया है, जो अब प्रस्थान से चार घंटे पहले के बजाय नौ से 18 घंटे पहले तैयार किया जाता है।





